जगतगुरु स्वामी ब्रह्मानंद जी महाराज का जन्म 24 दिसम्बर 1908 को हरियाणा प्रांत के चूहड़ माजरा (कैथल) मे रोड़ क्षत्रिय वंश मे माता रामी देवी और पिता बदामा राम के घर हुआ। गुरु जी का बचपन का नाम छोटाराम था। मात्र 9 वर्ष की आयु मे माता जी का देहांत हो गया और जब गुरू जी 11 वर्ष के थे तब इनके पिता जी स्वर्ग सुधार गए। गुरु जी ने बचपन मे श्री कृष्ण रूप धारण करके गाय चराई। गुरू जी 12 वर्ष की आयु मे ज्ञान की खोज मे गुरूकुल चले गए। सत्य ज्ञान की खोज मे गुरु जी तपस्या के लिये हरिद्वार से आगे सप्त सरोवर के जंगलो मे चले गए, वहां गुरु जी ने आपने शरीर को त्यागने का निर्णय लिया, तभी तीन देवियो ने प्रकट होकर स्वामी जी को पचरंगा झण्डा भेंट किया और वैदिक धर्म के प्रचार लोक कल्याण के लिये वचनबद्ध किया। ब्रह्म आनंद मे लीन रहने के कारण देवियों ने गुरु जी का नाम ब्रह्मानन्द रखा। गुरू जी ने पंचरंगे झण्डे के पांच नियम बनाए और फिर गुरू जी ने ओमपुरा नाम से गुरूकुल की स्थापना की। कुछ वर्षो के पश्चात गुरू जी वैदिक धर्म के प्रचार के लिए निकल पड़े, गुरू जी ने पूरे देश मे हवन यज्ञ और भण्डारो का आयोजन किया। गुरु ब्रह्मानन्द सरस्वती ने वेद शास्त्रों के स्वाध्याय से इस बात को भली भांति जान लिया था कि यदि संपूर्ण विश्व का कल्याण हो सकता है तो वह वेद की शिक्षाओं को जीवन में उतारने से ही हो सकता है। वेद की शिक्षाओं का संपूर्ण विश्व में प्रचार हो इसलिए गुरु जी ने पूरे भारत में भ्रमण करके बड़े-बड़े यज्ञ और भंडारों के माध्यम से वेदों का सदुपदेश जन जन तक पहुंचाया। लक्ष्मी गुरू जी के पीछे पीछे फिरती थी पर कभी भी इन्होने पैसे को हाथ नही लगाया। गुरू जी ने अपना सारा जीवन भोली भाली जनता और नारी जाति के उधार मे लगा दिया। जब नारी का घर से बहार निकलना भी बंद होता था और शिक्षा तो दूर की बात थी, उस समय में भी गुरू जी ने नारी को वैदिक शिक्षा और हवन यज्ञ करना सिखाया तथा अपने जीवन मेे मानव कल्याण हेतु 5 ग्रंथ पचासा, नीति विचार, ब्रह्मविचार, शारीर कोपनिशाद, गो रक्षा लिखे। अनेक समय पर गुरू जी ने अपनी भक्ति शक्ति परिचय भी दिया। गुरु जी ने महर्षि दयानंद जी व अपने गुरु भीष्म आर्य जी की तरह वैदिक धर्म का प्रचार किया, इसके लिए गुरु जी ने अनेकों गुरुकुल खोलें व यज्ञशालाएं बनवाई। गुरु जी 16 मई 1973 को फतेहपुर आश्रम मे तीन बार ॐ का उच्चारण करते हुए शरीर को त्याग कर ब्रह्मलीन हो गए।
ओ३म तत्सत्
ओ३म गुरु जी
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